सोमवार, 4 अगस्त 2014

डाक्टर साम्भा


   सोनीपत की गलियों में एक महान डॉक्टर हुए हैं ये मुझे अपने दोस्त लकी से पता चला  उनके नैन नक्श बिल्कुल शोले के साम्भा से मिलते हैं .. (वही गब्बर का राइट हैंड  साम्भा जो होली कब है? नामक प्रश्न का सही उत्तर बताकर कालजयी हो गया )
संभाजी के बड़े जलवे थे घी पिलाई तीर सी मुछें मरीज को ही नहीं,  उस की बीमारी को भी थर्रा देती थी.. दाढ़ी पर हाथ फेरते सोचते रहते थे.... मौका मिलते ही रिसर्च करने.... हाँ भाई ! रिसर्च!  अपनी जिंदगी वे एक आविष्कार के लिये प्रयासरत रहे। 
साधारण बीमारियों के लिये उनके पास चार पांच रंगो वाली गोलियाँ थीं जो सीधे बिना बीमारी बताए हाथ में थमा दी जाती थीं पता नही उन हाथों में ही जादू था वरना सेंकडो प्रकार की बीमारियाँ एक सी गोली से ही ठीक कैसे हो जाती ? हालाँकि उस गोली का रासायनिक संघठन पता लगाने के बहुतेरे प्रयास किये गए किन्तु इतना आसान होता सब तो  साम्भा साम्भा न होते ...
राजदूत मोटर साइकिल को आते देख सभी उनको रास्ता दे देते थे कि कोई ना कोई इमरजेंसी ही होगी इतना सम्मान आज भी अम्बुलेंस को नहीं दिया जाता है.....
बकरी और आदमी कि अलग अलग बीमारियों को एक समान गोली से छु मन्तर कर देते थे और लोग-बाग उनकी कुशलता पर अवाक् रह जाते थेसभी चाहते थे कि उनका रिसर्च जल्द पूरा हो क्यूँ कि वही उनका अन्तिम ध्येय था
एक के बाद एक 2 लड़कियों के बाद उनके जुड़वाँ लडके हुवे, उन दोनों बच्चों को गोद में लेकर उन्होंने सफलता की  घोषणा कर बताया कि इतने बर्षों का उनका प्रयास रंग लाया है लड़के पैदा करने वाली दवाई बन चुकी है..
डॉ,साम्भा कि विश्वनीयता सोने सी खरी थी दवाइयां बिकी तो बिकी.. एक्सपोर्ट हुई सो अलग! मतलब रिश्ते नातेदारों को भी भेजी गई  ..
लेकिन पुत्र प्रेमी हरियाणा से शायद भगवान भी असंतुष्ट था..नवें महीने से ही शिकायते आने लगी सबके लडकियां पैदा हो रहीं थी कई लोगों ने डॉ साम्भा पर हाथ भी आजमाए। एक आध हड्डियां तोड़ी , दूसरों के लिये रखी मरहम पट्टी उन्हें अपने ही करनी पड रही थी किन्तु उन्हें इस सबका दुःख नहीं था।  दुःख था तो अपने महान रिसर्च के असफल होने का.....................
खैर !! किसी जमाने में उनकी राजदूत मोटर साइकिल के दोनों तरफ दवाइयां टंगी रहती थीं आज वही डॉ साम्भा साइकिल पर चलते हैं हालाँकि उनकी नई रिसर्च अब आचार के बारे में होती हैं।  अपनी साइकिल पर आचार के डिब्बे लटकाए दूरदराज गाँवो में अब भी सम्भा के रौबदार चेहरे से आज भी आवाज़ गूंजती है आचार लेलो!! बढिया आचार !! निम्बू मिर्च आम का आचार ले लो !!!!!!!!!!!!!!!  


   

शुक्रवार, 14 मार्च 2014

अजीब सा समय है ये........ !!!!


       बड़ा अजीब सा समय है, सब कुछ उल्टा है आजकल, खबर विज्ञापन हो गई हैं और खबरनवीस नेता हो गए हैं  l नेता कारोबार करते हैं और कारोबारी अपराधी हो गए हैं  l  अपराधी तानाशाह हो गए हैं तानाशाहों का चुनाव होने लगा है  l
     हर तरफ विडंबनाएं और त्रासदियाँ हैं। रोज ही सुनते हैं कि रुपया गिर रहा है, लेकिन अमीर के नीचे खड़े गरीबों की झोली में एक खोटा-सिक्का भी नहीं गिरा है और मुद्रा जो की है ही नही, वही bitcoin सबसे महंगी मुद्रा है  l भूमंडलीकरण हो चुका है लेकिन गांव की सब्जियां गांव में ही सड़ रही है  l किसान बैल न होने की वजह से आत्महत्या कर रहा है , लेकिन शेयर बाज़ार में ‘बुल्स‘ की भरमार है
      आजादी की अहमियत सभी मानने लगे हैं लेकिन आजादख्याल लड़की समाज के लिए खतरा है  l प्रेम दिवस विरोधी दक्षिणपंथी प्रचारक प्रेम के जुर्म में पकड़े जा रहे है और जिन महात्माओं ने ब्रह्मचर्य का पाठ पढाया, वे स्वयं बलात्कार के मामलो में आरोपी हैं  l लिंगानुपात गिर रहा है लेकिन दहेज अभी भी लड़की वाले ही देते हैं  l दलितों के हाथी ब्राह्मणों को सवारी करवा रहे हैं, लेकिन दलित घोड़ी से उतारे जा रहे हैं  l जनसाखिकीय लाभांश का समय चल रहा है लेकिन युवा बेरोजगार है। आतंकी घटनायें कम हो चुकी हैं , लेकिन महिलाओ ने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया है।
     लोग अहिंसक धरना दे रहे हैं लेकिन संसद हिंसा के अखाड़े से कम नही है और लोकसभा चैनल देखने वाले शान से दूसरे दिन पटरी उखाड़ दे रहें हैं। कार्यपालिका में कार्य, विधायिका में विधेयक और न्यायपालिका में न्याय ही अटका पड़ा है।    
     जंगल काटने वाले टी-ब्रेक में पेड़ बचाने के नुस्खे सोच रहे हैं और बर्ड-फ्लू से बचने के चक्कर में शाकाहारी हुए लोग जैवविविधता को बचा रहे हैं। उत्तर-पूर्व में भारत को चीन से खतरा है भारत में  उ.पूर्वी भारतीयों को भारतीयों से ही खतरा है !!  पाकिस्तान के क्रिकेटरों की जिंदाबाद देशद्रोह है लेकिन सानिया मिर्ज़ा अभी भी भारत के लिए मेडल लाती हैं  
     जिस पार्टी के नाम में समाजवादी है वो समाजवादी ही नहीं है  l मजदूर पत्थर लेकिन मार्क्सवादी विचार ढोने में व्यस्त हैं और माओवादी पूंजीपतियों से चंदा लेकर सुरक्षा की गारंटी दे रहे हैं और इसी चंदे से बंदूक खरीदकर आदिवासी लडकों को मरवा रहें है  l आदिवासी क्षेत्रों में विस्थापन वाला विकास जोर-शोर से जारी है, लेकिन अखबार की तस्वीर में वे अभी भी घेरा बनाकर खुशी से नाच रहे हैं.  l ........-अरविन्द    

शनिवार, 8 मार्च 2014

सहिष्णुता का गुड गोबर

    
मेरठ में कश्मीरी छात्रों द्वारा पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाना कितना गलत कितना सही , नही पता। लेकिन इस घटना का प्रचार खूब हुआ, मामला भी शायद प्रचार के  लिए दर्ज हुआ हो कौन जाने ? चुनाव सर पर है .. .  
जामिया हॉस्टल की यादें  ताजा हो आई, मैच के दौरान मुस्लिम छात्रों में भी दो ग्रुप बन जाते थे और एक ही टीवी हॉल में नोक-झोंक चलती रहती किन्तु ज्यादातर स्टुडेंट्स शुरू में ग्रुप्स से अलग रहते बाद में जिस टीम का पलड़ा भारी होता उसके ग्रुप में आ जाते। 
मुझे याद है, बटला हाउस में भारत के विश्व कप जीतने की खुशी मनाते समूहों से  देर रात तक गलियां रोशन थी,  लेकिन ऐसी घटनायें याद नहीं रखनी होती, बतानी नही होती , ऐसे प्रचार से सौहार्द पनप जाने का खतरा होता है ......
 अक्सर ऐसे मुद्दों पर बहुसंख्यको के मन में कई भ्रान्तियां होती है सतही तर्क होते है। कश्मीर में आतंकी घटनाओं और उनके बाद अफ्स्पा ने भय का माहौल  बना दिया।  370 के दर्जे के बाद भी केन्द्रीय कानून और संस्थाओ का फैलाव रुका नहीं ! हिंसा, अपवाद ग्रस्त न्याय, बेरोजगारी, पिछड़ापन , अव्वल दर्जे की कौशल और शिक्षण संस्थाओ का अभाव गुस्से का माहौल तो तैयार करेंगे ही!   तिस पर भी जिस देश की अखंडता के लिए आप ये सब सहते है वहाँ के हर कोने में आपको कश्मीरी ही समझा जाये , भारतीय नही . हमारे लिए कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है किन्तु कश्मीरी नहीं !!! 
ये उनका अपराध नही, निराशा , हताशा की अभिव्यक्ति है . पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लगाने वाले कुछ निराश भटके युवको पर संगीन मुकदमा चलाने से अलगाव ही पनपेगा न ही इससे हिंदुस्तान ज़िंदाबाद हो पायेगा।   समावेशी सहिष्णु भारतीय संस्कृति गुड़ गोबर भले हो जाये।    
 अल्पसंख्यको को भी समझना होगा पाकिस्तान जिंदाबाद बोलने से मुर्दे वापस नही आयेंगे , न रोजगार मिलेगा, किन्तु नफरत अवश्य ही बढेगी। कई पीढियों तक ऐसे तुच्छ मुद्दों में उलझे रहने से  “सच्चर-सहानुभूति“ का ही इंतजार करते रहना होगा। 


अल्प-बहू  सभी संख्यको!!  पाकिस्तान जिंदाबाद बोलने से पाकिस्तान नही जीतता है।  मैच  फिक्सिंग के कारनामे जितने सामने आ पाते है, वास्तव में  उनसे ज्यादा ही  होते है। देशद्रोह के मुकदमे चलाने ही है तो क्रिकेट मैच के जिन्दाबाद- मुर्दाबाद से ध्यान हटाओ। रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार करने वाले ज्यादा मुकम्मल टारगेट रहेंगे !!!.  

रविवार, 26 जनवरी 2014

"घसीटेंगे तुझे तेरे सुसाइड तक"

                    अभी इधर आर्यावृत में अंतहीन बलात्कारों  की श्रेणी में जइसे ही लेटस्ट वाला अपडेट हुआ नहीं , के ऑनलाइन गुप्त सूत्र वाला  सर्चिंग ऑपरेशन  चालू हो चुका होगा …।  किशोरी के कपड़े वियाग्रा टाइप तो नही थे …दलित थी ,ब्राह्मण थी , आदिवासी थी , जमींदार थी, बुजुर्वा थी , मजदूर थी  ......पहाड़ी थी , मैदानी थी , नॉर्थ इंडियन कि साउथ ????? धर्म कर्म में कछु विस्वास था के नहीं। ...लेट नाईट पार्टी जाती थी के नही , कौन प्रसाधन  लगाती थी .  जइसे ही इ गूगल कछु उगल दे , किसी अपडेट से पता चले खेमे वाले तैयार , उठाइके हथियार कुतर्को से लैस  , इहाँ  दोबारा चौपाल लगाते है। 

                          आम -वाम  ,  खास -खासमखास , अराजक -स्वराजक , मनुवादी -मुन्नीवादी , 56 सीनाजोर- ऎ के 47- 12 बोर   ,अहिंसक और आदमखोर सभी निमंत्रित है , आओ गणतंत्र दिवस पे पद - संचालन की परंपरा  का अनुसरण करते  हुए एक स्वर में चिल्लायें .... लेफ्ट राईट लेफ्ट , लाभपुर की हानि के उपलक्ष में समाज को कायर-भूम बनायें, गरियायें ,लतियाये .. चिल्लाये और तिस पर जारी कर दें फतवे सा  मैग्नाकार्टा उसी चौपाल कि तरह ....  कि वो हमारी  बिरादरी से बाहर है, ये अंदर है।         

                           मेट्रो का लास्ट स्टॉप आते आते कुछ अइसा अपडेट कर दें ,कुछ साबित कर दें , जिससे मर्दों को दर्द न हो।  सारी दामिनियां मोमबत्ती की लौ बुझते-बुझते बुझ जाये और हम  इंडिया गेट के तालाब में चिप्स पैकेट फेंकने से मरती मछलियों के तड़पने का चित्र बनाएँ।  जंतर मंतर कि भूलभुलैया में शोकपाल मनाये!!!!    जिसे हमारी बिरादरी के  अंदर रहना है सोशल साइट्स के मंच पर आये कपड़े उतार  के, वरना चीरहरण करवाए।।।।     "घसीटेंगे तुझे तेरे सुसाइड तक" का नारा लगा के, वरना  हम  भी मर्द नही , उत्तरआधुनिकतावाद के ....... .   
                          कही से पता करो  नक्सल प्रभावित एरिया में तो नही लगी चौपाल , सरकारी मशीनरी बंगाल कि खाड़ी से अभिक्रिया कर जंगभरी हो गई है खबरदार!!!! ई जंग साफ होगा  , अब उस नासमझ युवा के सिर से  खून से जो  इंडिया गेट , राष्ट्रपति भवन के पास गुस्से से मुँह फुलाए जायेगा  !!! बैठे रहो बच्चू धुप सेको और मूंगफली के उपर बहाने छिड़को और खा जाओ   !  मोमबतियां न जलाओ आजकल बिजली सस्ती हो गई है। 
                            समाज शास्त्रीयों!!!!! इस समूची हरकत को जस्टिफाई कर डालो समाज  जो देता है इतना कुछ  और  अपने आप में व्यवस्था की छोटी इकाई है ......  के नियम  है ,  मानने होंगे। 

 सभी क्रूर सिंह के क्लोन हथकंडे बाज मर्दों को जीत की अग्रिम लख -लख  बधाइयां ................