मेरठ में कश्मीरी छात्रों
द्वारा पाकिस्तान की जीत का जश्न मनाना कितना गलत कितना सही , नही पता। लेकिन इस घटना का प्रचार खूब हुआ, मामला भी
शायद प्रचार के लिए दर्ज हुआ हो कौन जाने
? चुनाव सर पर है .. .
जामिया हॉस्टल की यादें ताजा हो आई, मैच के दौरान मुस्लिम छात्रों में भी दो ग्रुप बन जाते थे और एक ही टीवी हॉल में
नोक-झोंक चलती रहती किन्तु ज्यादातर स्टुडेंट्स शुरू में ग्रुप्स से अलग रहते बाद
में जिस टीम का पलड़ा भारी होता उसके ग्रुप में आ जाते।
मुझे याद है, बटला हाउस में भारत के विश्व कप जीतने की खुशी
मनाते समूहों से देर रात तक गलियां रोशन
थी, लेकिन ऐसी घटनायें याद नहीं रखनी होती,
बतानी नही होती , ऐसे प्रचार से सौहार्द पनप जाने का खतरा होता है ......
अक्सर ऐसे मुद्दों पर बहुसंख्यको के मन में कई
भ्रान्तियां होती है सतही तर्क होते है। कश्मीर में आतंकी घटनाओं और उनके बाद अफ्स्पा ने भय का माहौल बना दिया। 370 के दर्जे के बाद भी केन्द्रीय कानून और संस्थाओ
का फैलाव रुका नहीं ! हिंसा, अपवाद ग्रस्त न्याय, बेरोजगारी, पिछड़ापन , अव्वल
दर्जे की कौशल और शिक्षण संस्थाओ का अभाव गुस्से का माहौल तो तैयार करेंगे ही! तिस पर
भी जिस देश की अखंडता के लिए आप ये सब सहते है वहाँ के हर कोने में आपको कश्मीरी
ही समझा जाये , भारतीय नही . हमारे लिए कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है किन्तु
कश्मीरी नहीं !!!
ये उनका अपराध नही, निराशा
, हताशा की अभिव्यक्ति है . पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा लगाने वाले कुछ निराश भटके
युवको पर संगीन मुकदमा चलाने से अलगाव ही पनपेगा न ही इससे हिंदुस्तान ज़िंदाबाद हो पायेगा। समावेशी सहिष्णु भारतीय संस्कृति गुड़ गोबर भले हो जाये।
अल्पसंख्यको को भी समझना होगा पाकिस्तान
जिंदाबाद बोलने से मुर्दे वापस नही आयेंगे , न रोजगार मिलेगा, किन्तु नफरत अवश्य ही
बढेगी। कई पीढियों तक ऐसे तुच्छ मुद्दों में उलझे रहने से “सच्चर-सहानुभूति“ का ही इंतजार करते रहना होगा।
अल्प-बहू सभी संख्यको!! पाकिस्तान जिंदाबाद बोलने से पाकिस्तान नही
जीतता है। मैच फिक्सिंग के कारनामे जितने सामने आ पाते है, वास्तव में उनसे ज्यादा ही होते है। देशद्रोह के मुकदमे चलाने ही है तो क्रिकेट मैच
के जिन्दाबाद- मुर्दाबाद से ध्यान हटाओ। रक्षा खरीद में भ्रष्टाचार करने वाले ज्यादा मुकम्मल टारगेट रहेंगे !!!.
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