अजान और अगरबती
ईद की सेवैयां हो या होली के रंग।
मिटटी के घरोंदे
शक्कर से लेकर खिलोने।
एक-आध कटोरी साग
चूल्हे और हुक्के की आग।
खेत में कभी दरांती-कुदाली
चाय से लेकर दारू की प्याली।
खूब फेंटी ताश
बैठ पूरे जेठ एक खाट।
लेकिन आज ,
अगरबती की महक और अजान की आवाज़
फिर से ,
घर-घर गई ,कानों से टकराई
लाशो के बीच में , निर्जीव नथुनों से
और ,
बदलती गई चीख़ और सड़ांध में ,
गाँव बदल गया श्मशान में।
अरविंद