रविवार, 22 सितंबर 2013


अजान और अगरबती



सब कुछ बंटा संग -संग 
ईद की सेवैयां हो या  होली के  रंग। 

मिटटी के घरोंदे 
शक्कर से लेकर खिलोने। 

एक-आध कटोरी साग 
चूल्हे और हुक्के की आग। 

 खेत में कभी  दरांती-कुदाली 
चाय से लेकर  दारू की प्याली। 
  
खूब फेंटी ताश 
बैठ पूरे जेठ एक खाट। 

लेकिन आज ,
अगरबती की महक और अजान की आवाज़
 
फिर से , 


घर-घर गई ,कानों से टकराई 
लाशो के बीच में , निर्जीव नथुनों से 

और ,

 बदलती गई चीख़ और सड़ांध में ,
गाँव बदल गया श्मशान में। 
                                              अरविंद 


कोई टिप्पणी नहीं: